
जबलपुर। भारतीय सेना की मारक ताकत बढ़ाने के लिए जबलपुर स्थित गन कैरिज फैक्टरी ने 105 एमएम लाइट फील्ड गन के आधुनिकीकरण का बड़ा काम शुरू किया है। लगभग 5 दशक पुरानी इस प्रतिष्ठित स्वदेशी तोप को अब अत्याधुनिक डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम और नई संचार तकनीक से पूरी तरह लैस किया जा रहा है। सेना की नई जरूरतों को ध्यान में रखते हुए जीसीएफ को इसके व्यापक निर्माण और तकनीकी सुधार का विशेष लक्ष्य मिला है। हल्के वजन और जबरदस्त मारक क्षमता के कारण यह तोप सेना के अग्रिम दस्तों का मुख्य आधार रही है। अब फैक्टरी के विशेषज्ञ वैज्ञानिक और तकनीकी दल इसे भविष्य के युद्धक्षेत्र की आधुनिक चुनौतियों के पूरी तरह अनुकूल बनाने में जुटे हैं, जिससे सैन्य मोर्चों पर जमीनी पकड़ पहले से ज्यादा अभेद्य और प्रभावी हो सकेगी।
मारक दूरी बढ़कर 24 किलोमीटर तक पहुंचेगी
तकनीकी अपग्रेडेशन के बाद एलएफजी तोप की मारक क्षमता में भारी इजाफा दर्ज होगा। वर्तमान समय में इसकी रेंज 17 से 20 किलोमीटर तक सीमित है, जिसे उन्नत प्रणाली के जरिए बढ़ाकर सीधे 24 किलोमीटर तक पहुंचाया जाएगा। इस क्षमता विस्तार से सीमा पार बैठे दुश्मनों के ठिकानों पर अचूक निशाना साधना संभव होगा। नए संस्करण में एकीकृत होने वाले कंप्यूटर आधारित सेंसर और लक्ष्य साधने वाले उपकरण इसकी सटीकता को कई गुना बढ़ा देंगे। इसके साथ ही यह तोप प्रति 1 मिनट में 6 से 7 गोले दागने की असाधारण रफ्तार प्रदान करती है, जिससे युद्ध के समय कम अंतराल में विरोधी दल पर लगातार भारी गोलाबारी की जा सकेगी। आधुनिक सुधारों के बाद यह कम समय में लक्ष्य पर भारी प्रहार करने वाला अत्यंत घातक माध्यम साबित होगी।
दुर्गम मोर्चों पर 2380 किलो वजन भी बनेगा मददगार
इस तोप का कुल वजन केवल 2380 किलोग्राम है, जो पुरानी पारंपरिक फील्ड गनों की तुलना में काफी हल्का है। कम वजन होने के कारण इसे ऊंचे पहाड़ी रास्तों, घने जंगलों, रेतीले मैदानों और उबड़-खाबड़ सरहदी इलाकों में बिना किसी बड़ी परेशानी के तुरंत तैनात किया जा सकता है। आपातकालीन परिस्थितियों में सेना के विशेष वाहन या हेलीकॉप्टर इसे आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जा सकते हैं। दुर्गम और संकरे मोर्चों पर जहां भारी तोपखाने को पहुंचाना बेहद कठिन होता है, वहां यह हल्की तोप त्वरित गतिशीलता प्रदान करती है। सैनिकों के लिए इसे स्थापित करना और संचालन के बाद सुरक्षित स्थान पर ले जाना बेहद सुगम रहता है, जिससे मैदानी कार्रवाई में भारी रणनीतिक बढ़त हासिल होती है।
गणतंत्र दिवस की 21 तोपों में शामिल
राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में यह स्वदेशी तोप अपनी विशिष्ट पहचान बना चुकी है। गणतंत्र दिवस के राष्ट्रीय समारोह में दी जाने वाली ऐतिहासिक 21 तोपों की सलामी में ब्रिटिश काल की पुरानी तोपों को हटाकर इसी देश में बनी गन का इस्तेमाल गर्व के साथ किया जाता है। जीसीएफ संस्थान पिछले 4 दशक से इस विशेष तोप के निर्माण और रख-रखाव का दायित्व निभा रहा है। बीच के कुछ वर्षों में मांग कम रहने से उत्पादन की गति धीमी पड़ गई थी, लेकिन अब सेना की नई मांगों के साथ इस कारखाने में निर्माण कार्य फिर पूरी तेजी से शुरू हो चुका है। फैक्टरी परिसर में पुरानी बंदूकों को आधुनिक तकनीक से लैस करने का काम युद्धस्तर पर संचालित हो रहा है।
