अधूरी ख्वाहिशों का भी अपना एक सुकून होता है…

Newzo
Newzo - News Editor 57 Views
3 Min Read

श्री शशिकांत ओझा, मुख्य जनसंपर्क अधिकारी, पॉवर ट्रांसमिशन कम्पनी

मनुष्य का जीवन इच्छाओं की एक अनंत श्रृंखला है। बचपन में खेलते रहने की चाह, युवावस्था में सफलता और प्रतिष्ठा की आकांक्षा, फिर जीवन के उत्तरार्ध में सम्मान, प्रेम और आत्मिक शांति की तलाश। ख्वाहिशें जन्म लेती रहती हैं और हम उनके पीछे चलते रहते हैं। कुछ पूरी हो जाती हैं, कुछ समय के साथ बदल जाती हैं और कुछ हमेशा के लिए अधूरी रह जाती हैं।

परंतु जीवन का सबसे बड़ा सत्य यह है कि सुख केवल इच्छाओं की पूर्ति में नहीं, बल्कि उनकी सीमा को समझने में है। भारतीय दर्शन कहता है कि इच्छा ही दुःख का मूल कारण है। जितनी अधिक अपेक्षाएँ, उतनी अधिक व्याकुलता। इसलिए अधूरी ख्वाहिशें कभी-कभी हमें वह सिखा देती हैं, जो पूरी हुई इच्छाएँ नहीं सिखा पातीं।

समय के विशाल कैनवास पर जब हम अपने बीते वर्षों को देखते हैं, तो पाते हैं कि जिन बातों के लिए कभी रातों की नींद उड़ गई थी, वे आज उतनी महत्वपूर्ण नहीं रहीं। जिन सपनों के टूटने पर लगा था कि सब कुछ समाप्त हो गया, वही टूटन आगे चलकर हमारी सबसे बड़ी शक्ति बन गई। जीवन ने हमें वहाँ नहीं पहुँचाया जहाँ हम जाना चाहते थे, बल्कि वहाँ पहुँचाया जहाँ हमें होना चाहिए था।

लगता है कि अधूरी ख्वाहिशें हमारे अहंकार को कम करती हैं और यह संभवतः यह बोध भी कराती हैं कि हम सब कुछ नियंत्रित नहीं कर सकते। हर घटना, हर उपलब्धि और हर असफलता के पीछे कोई न कोई गहरा अर्थ छिपा होता है। शायद इसी का नाम ईश्वर की इच्छा, प्रकृति का विधान या नियति का रहस्य है।

कभी-कभी इस सोच में भी पड़ जाते हैं कि जो नहीं मिला क्या वही सबसे बड़ा वरदान साबित हुआ । ऐसा समझ में आता है कि यदि जीवन हमारी हर इच्छा पूरी कर देता, तो न धैर्य का मूल्य समझ आता, न प्रतीक्षा का सौंदर्य और न ही संतोष का आनंद।

क्या अधूरी ख्वाहिशों को बोझ की तरह नहीं, बल्कि जीवन के उन अध्यायों की तरह देखना पडेगा जिन्होंने हमें तथाकथित परिपक्व , मजबूत बनाने के साथ वास्तविकता से परिचित कराया।
और जो आज भी अधूरा है, क्या वह हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रहा है।

“अधूरी ख्वाहिशें अक्सर आत्मा को वह सुकून दे जाती हैं, जो पूरी हुई इच्छाएँ भी नहीं दे पातीं।“

Share This Article
error: This Content is protected !!