कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद भी सुलझ न सका पदोन्नति का मुद्दा

जबलपुर। मध्यप्रदेश की विद्युत कंपनियों में कार्यरत हजारों अधिकारियों की पदोन्नति का भविष्य वर्ष 2011 से जारी ऊर्जा विभाग के एक परिपत्र के इर्द-गिर्द सिमट गया है। वर्ष 2003 में विद्युत अधिनियम के तहत मंडल के पुनर्गठन और ट्रांसफर स्कीम के माध्यम से उत्पादन, पारेषण और वितरण कंपनियों का गठन हुआ था। मंडल के कर्मचारियों को इन कंपनियों में समायोजित किया गया, जिसके बाद 28.12.2010 को पदों का निर्धारण हुआ। लेकिन 09.06.2011 को जारी ऊर्जा विभाग के पत्र क्रमांक 4992/13/2011/उ.स./एम.डी. ने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी, जिसने आज तक विवादों को जन्म दे रखा है। इस परिपत्र के बिंदु 2 में यह व्यवस्था दी गई थी कि जब तक मंडल से नियुक्त कर्मचारी उपलब्ध हैं, तब तक उन पदों पर कंपनी के नए अधिकारियों की नियुक्ति नहीं होगी। यह नियम वर्तमान में पदोन्नति और वरिष्ठता के संघर्ष का मुख्य कारण बना हुआ है।
बोर्ड कैडर के आरक्षण ने रोकी विकास की राह
वर्ष 2011 से 2020 के बीच यह परिपत्र कंपनी के नए अधिकारियों के करियर में एक बड़ी बाधा बनकर सामने आया है। इस दौरान पदोन्नति के अवसरों में भारी कमी आई और कर्मचारियों के बीच असंतोष गहराने लगा। स्थिति तब और अधिक जटिल हो गई जब Power Engineers & Employees Association ने 28.05.2020 को ऊर्जा विभाग के सामने अपनी आपत्ति दर्ज कराई। इसके बाद मामला माननीय उच्च न्यायालय, मध्यप्रदेश, जबलपुर की चौखट तक पहुंचा। 13.07.2021 को उच्च न्यायालय ने ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव को निर्देश दिए कि वे 60 दिनों के भीतर इस पर विधिसम्मत निर्णय लें। विभाग ने एक विस्तृत आदेश जारी किया, लेकिन विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका।
पुराने नियमों की जकड़ से परेशान हैं अधिकारी
वर्ष 2022 से 2026 के बीच मध्यप्रदेश विद्युत मण्डल अभियंता संघ ने निरंतर मांग की कि बोर्ड कैडर आरक्षण की व्यवस्था को समाप्त किया जाए। संघ का तर्क है कि 09.06.2011 के परिपत्र की गलत व्याख्या की जा रही है, जिसका सीधा असर प्रतिभावान अधिकारियों पर पड़ रहा है। ताजा विवाद तब सामने आया जब 09-10 जुलाई 2026 को सहायक अभियंता से कार्यपालन अभियंता पदोन्नति आदेश जारी किए गए। इन आदेशों में बड़ी संख्या में पदों को बोर्ड कैडर के नाम पर रिक्त छोड़ दिया गया है। प्रभावित अधिकारियों ने इस व्यवस्था का कड़ा विरोध करते हुए इसे पदोन्नति प्रक्रिया में मनमाना हस्तक्षेप करार दिया है। विद्युत क्षेत्र की यह पदोन्नति नीति अब एक बड़े प्रशासनिक और कानूनी मोड़ पर खड़ी है।
