
अधिकारियों के दौरे सिर्फ फोटो खिंचवाने तक सीमित, रिपोर्ट में सब कुछ ऑल इज वेल
जब पानी सप्लाई के लिए पैसे नहीं, तो बैनर-पोस्टर के लिए कहां से आया फंड
राष्ट्रीय रैंकिंग से पेट नहीं भरता, ग्रामीणों ने खोला मोर्चा
डिंडोरी। जिले को जल संवर्धन के क्षेत्र में देश में पहला स्थान मिलने का सरकारी दावा जमीनी हकीकत से कोसों दूर नजर आ रहा है। एक तरफ प्रशासन बड़े-बड़े पोस्टरों, बैनरों और सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी पीठ थपथपा रहा है, वहीं दूसरी तरफ शहपुरा जनपद पंचायत के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत किकरातलाब में पिछले कई महीनों से नल-जल योजना पूरी तरह ठप पड़ी है। भीषण गर्मी के इस मौसम में गांव की महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग कई किलोमीटर दूर से पानी ढोने को मजबूर हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जिम्मेदार अधिकारियों और पंचायत प्रशासन के पास इस गंभीर संकट का केवल एक ही रटा-रटाया जवाब है कि पंचायत के पास बिजली बिल जमा करने के लिए बजट उपलब्ध नहीं है। ग्रामीण अब खुलेआम यह सवाल उठा रहे हैं कि जब जनता को पीने का पानी देने के लिए फंड नहीं है, तो जल संवर्धन के झूठे प्रचार और कागजी वाहवाही के नाम पर लाखों रुपये के बिल कैसे पास कर दिए गए।
कागजी दावों और जमीनी हकीकत का बड़ा अंतर्विरोध
सरकारी बैठकों और कार्यक्रमों में डिंडोरी को जल प्रबंधन में ऐतिहासिक काम करने वाला जिला बताया जा रहा है। कागजों में तालाबों के निर्माण, जल संरक्षण और विकास के बड़े-बड़े आंकड़े पेश कर पुरस्कार बटोरे जा रहे हैं। इसके विपरीत किकरातलाब गांव की हकीकत यह है कि सरकारी अमले के दौरे केवल औपचारिकता और फोटो खिंचवाने तक सीमित होकर रह गए हैं। अधिकारी अपनी रिपोर्ट में सब कुछ संतोषजनक दिखा देते हैं, जबकि असलियत में लोग पानी जैसी बुनियादी जरूरत के लिए हर दिन संघर्ष कर रहे हैं। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि जल संवर्धन के नाम पर भारी-भरकम और कथित तौर पर फर्जी बिल लगाकर सरकारी राशि का बंदरबांट किया गया है, जबकि जमीनी व्यवस्था शून्य है।
प्रचार पर लाखों का खर्च और बिजली बिल के लिए बजट का रोना
गांव के लोगों का कहना है कि यदि प्रचार-प्रसार और होर्डिंग्स पर पानी की तरह बहाए गए पैसे का छोटा सा हिस्सा भी बिजली बिल के भुगतान और नल-जल योजना को चालू रखने में लगाया जाता, तो आज पूरे गांव को इस तरह प्यास से बेहाल नहीं होना पड़ता। प्रशासन ने इस पूरे अभियान को केवल सोशल मीडिया, वीडियो और विज्ञापनों तक सीमित कर दिया है। ग्रामीण यह पूछ रहे हैं कि क्या केवल राष्ट्रीय स्तर पर रैंकिंग और मेडल हासिल कर लेना ही प्रशासनिक सफलता का पैमाना है। जब तक गांव की महिलाओं के सिर से पानी के घड़े नहीं उतरते, तब तक ऐसे बड़े-बड़े दावे केवल जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने के समान हैं।
सरपंच के घर पर कथित बिजली चोरी के गंभीर आरोप

इस पूरे घटनाक्रम में एक नया और गंभीर मोड़ तब आया जब स्वयं ग्राम पंचायत सरपंच के घर पर ही कथित रूप से अवैध रूप से बिजली का उपयोग करने के आरोप सामने आए हैं। एक तरफ जहां पंचायत फंड की कमी का बहाना बनाकर आम जनता की पानी सप्लाई बंद करके बैठी है, वहीं दूसरी तरफ जिम्मेदार पद पर बैठे जनप्रतिनिधि के यहां नियमों की धज्जियां उड़ने की चर्चा पूरे क्षेत्र में है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि कोई साधारण नागरिक बिजली चोरी करता है तो विभाग तुरंत जुर्माना और कानूनी कार्रवाई करता है, लेकिन जनप्रतिनिधि के मामले में प्रशासन ने पूरी तरह चुप्पी साध रखी है, जो पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है।
ग्रामीणों का फूटा गुस्सा और निष्पक्ष जांच की मांग
लगातार उपेक्षा से नाराज किकरातलाब के ग्रामीणों का आक्रोश अब चरम पर पहुंच गया है। ग्रामीणों ने कई बार लिखित और मौखिक रूप से अधिकारियों को इस समस्या से अवगत कराया, लेकिन आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। अब ग्रामीणों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि नल-जल योजना को तुरंत चालू नहीं किया गया और बिजली बिल की व्यवस्था नहीं सुधारी गई, तो वे उग्र आंदोलन की राह पकड़ेंगे। इसके साथ ही ग्रामीणों ने जल संवर्धन के प्रचार में हुए खर्च, कथित फर्जी बिलों के भुगतान और सरपंच के घर पर लगी बिजली की निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करने की मांग उठाई है।
