तीन सीटों की जीत के बाद भाजपा अब केरल में स्थायी राजनीतिक जमीन बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। अपनी इसी रणनीति के तहत केरल में राजनीतिक पकड़ मजबूत करने के लिए भगवा पार्टी ने 13 सूत्रीय एजेंडा तैयार किया है। आइए समझते हैं इस एजेंडे के क्या मायने हैं…
दक्षिण भारत में लंबे समय तक सीमित राजनीतिक प्रभाव रखने वाली भाजपा अब केरल में अपने लिए स्थायी राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश में दिखाई दे रही है। हालिया विधानसभा चुनाव में तीन सीटों पर जीत ने पार्टी को नया आत्मविश्वास दिया है और इसी के बाद भाजपा ने राज्य के लिए 13 सूत्रीय राजनीतिक एजेंडा तैयार किया है। पार्टी का दावा है कि यही एजेंडा आगामी लोकसभा चुनाव से पहले उसकी राजनीतिक दिशा तय करेगा।
पार्टी ने इस एजेंडे में हिंदू पिछड़े समुदायों के बीच समर्थन को मजबूत करने, साथ ही अल्पसंख्यक समूहों तक पार्टी की पहुंच को भी नए सिरे से मजबूत करने पर स्पष्ट रूप से ध्यान केंद्रित किया है। पार्टी के एक सूत्र ने बताया कि यह एजेंडा शनिवार को प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर की अध्यक्षता में आयोजित भाजपा प्रदेश कोर कमेटी की बैठक में अपनाए गए एक राजनीतिक प्रस्ताव का हिस्सा है।
आखिर भाजपा को नई रणनीति की जरूरत क्यों पड़ी?
केरल लंबे समय से दो बड़े गठबंधनों-वाम मोर्चा (LDF) और कांग्रेस नीत UDF के बीच बंटा हुआ राजनीतिक राज्य रहा है। भाजपा को यहां अब तक वोट तो मिलते रहे, लेकिन सीटों में उसका असर बेहद सीमित रहा। हालांकि हालिया चुनाव में पार्टी की तीन सीटों पर जीत ने यह संकेत दिया कि भाजपा अब केवल “तीसरी ताकत” बने रहने के बजाय सामाजिक आधार विस्तार की दिशा में आगे बढ़ना चाहती है। पार्टी को यह भी समझ आ गया है कि सिर्फ हिंदुत्व की राजनीति के सहारे केरल में बड़ी सफलता हासिल करना आसान नहीं होगा। इसलिए अब भाजपा सामाजिक समीकरणों, जातीय समूहों और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच संतुलन साधने की रणनीति पर काम कर रही है।
OBC और एझवा समुदाय पर इतना फोकस क्यों?
भाजपा के नए एजेंडे का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हिंदू पिछड़े समुदायों तक पहुंच बढ़ाना है। खासतौर पर एझवा समुदाय पर पार्टी की नजर मानी जा रही है। केरल में एझवा समुदाय आबादी के लिहाज से बेहद प्रभावशाली माना जाता है और परंपरागत रूप से वामपंथी दलों विशेषकर माकपा और भाकपा का समर्थक रहा है।
भाजपा की कोशिश इस सामाजिक आधार में सेंध लगाने की है। इसी वजह से पार्टी ने OBC आरक्षण के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है। भाजपा का कहना है कि धार्मिक आरक्षण के नाम पर OBC कोटे का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए और आरक्षण केवल OBC, SC/ST और EWS तक सीमित रहना चाहिए। राज्य भाजपा अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने भी साफ कहा कि पार्टी पिछड़े वर्ग के आरक्षण को धर्म आधारित आरक्षण में नहीं बदलने देगी।
क्या भाजपा अल्पसंख्यकों से दूरी बना रही है?
दिलचस्प बात यह है कि भाजपा का नया एजेंडा एक तरफ हिंदू पिछड़े वर्गों पर जोर देता है, तो दूसरी तरफ अल्पसंख्यकों खासतौर पर ईसाई समुदाय के साथ संपर्क बनाए रखने की भी बात करता है। हालांकि पार्टी के भीतर अब इस रणनीति में बदलाव दिखाई दे रहा है।
कुछ समय पहले तक भाजपा केरल में चर्च नेतृत्व और ईसाई समुदाय के साथ सक्रिय संवाद बनाने की कोशिश कर रही थी। लेकिन अब पार्टी संस्थागत स्तर पर चर्च से दूरी बनाती दिख रही है। इसकी एक बड़ी वजह केंद्र सरकार के FCRA संशोधन विधेयक को लेकर कैथोलिक चर्च का विरोध माना जा रहा है। यह एक ऐसा घटनाक्रम रहा, जिसके कारण केरल विधानसभा चुनाव अभियान के दौरान भाजपा को बचाव की मुद्रा में आना पड़ा।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा अब चर्च नेतृत्व के बजाय सीधे ईसाई समुदाय के अलग-अलग वर्गों तक पहुंचने की रणनीति अपना सकती है,ताकि उसे “हिंदुत्व बनाम अल्पसंख्यक” वाली छवि से बाहर निकलने में मदद मिल सके।
शबरीमाला और हिंदुत्व एजेंडा फिर क्यों अहम हुआ?
भाजपा ने अपने प्रस्ताव में शबरीमाला मुद्दे को फिर से प्रमुखता दी है। साथ ही मंदिरों की संपत्तियों और परिसंपत्तियों के ऑडिट की मांग भी उठाई गई है। यह संकेत देता है कि पार्टी सामाजिक विस्तार की रणनीति के साथ-साथ अपने कोर हिंदुत्व एजेंडे को भी कमजोर नहीं पड़ने देना चाहती। दरअसल, भाजपा को लगता है कि केरल में धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े मुद्दे उसे एक मजबूत वैचारिक आधार दे सकते हैं। शबरीमाला आंदोलन के दौरान पार्टी को राज्य में एक बड़ा राजनीतिक नैरेटिव मिला था और अब वह उसे फिर से सक्रिय करना चाहती है।
क्या यह रणनीति सफल हो सकती है?
केरल की राजनीति में जातीय और धार्मिक संतुलन बेहद जटिल है। यहां मुस्लिम और ईसाई समुदाय मिलकर बड़ी आबादी बनाते हैं, जबकि हिंदू समाज भी कई सामाजिक समूहों में बंटा हुआ है। ऐसे में भाजपा की चुनौती सिर्फ वोट बढ़ाने की नहीं, बल्कि नए सामाजिक गठबंधन बनाने की है। यदि भाजपा OBC समुदायों में अपनी पकड़ मजबूत करती है और साथ ही ईसाई समुदाय के एक हिस्से को अपने साथ जोड़ने में सफल रहती है, तो वह आने वाले वर्षों में केरल की राजनीति में ज्यादा प्रभावशाली खिलाड़ी बन सकती है। लेकिन अगर उसकी हिंदुत्व राजनीति और अल्पसंख्यक आउटरीच के बीच संतुलन बिगड़ता है, तो यह रणनीति उलटी भी पड़ सकती है।
