
इंश्योरेंस कंपनी का घिनौना चेहरा, टारगेट के भूखे भेड़ियों ने वकील को बनाया शिकार
इलाज के दौरान अस्पताल के बेड पर पहुंचे जालसाज, खाते से उड़ाए ७ लाख रुपये
जबलपुर। जबलपुर के कानूनी गलियारों से लेकर कॉरपोरेट जगत को हिला देने वाला एक बेहद सनसनीखेज मामला सामने आया है। पीएनबी मेटलाइफ इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की जबलपुर शाखा और मुंबई प्रधान कार्यालय ने मिलकर शहर के ६१ वर्षीय वरिष्ठ अधिवक्ता राजेश मैंदीरत्ता को धोखाधड़ी का शिकार बनाया है। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग जबलपुर में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा ३५ के तहत दर्ज यह केस कॉरपोरेट जगत के काले चेहरों को बेनकाब करता है। रामपुर निवासी पीड़ित वकील जनवरी २०२५ में अपनी पुरानी ७ लाख रुपये की मैच्योरिटी राशि को सिर्फ १ साल के लिए सुरक्षित निवेश करना चाहते थे। लेकिन कंपनी की महिला कर्मचारी ने उनके दफ्तर आकर गिद्ध जैसी नजरें गड़ाईं और बिना किसी लॉक-इन पीरियड वाली सिंगल प्रीमियम पॉलिसी का झूठ बोलकर करोड़ों की चपत लगाने की नींव रख दी।
ऐसे खुला काले खेल का राज
धोखाधड़ी के एक बड़े खेल का पर्दाफाश तब हुआ जब जून २०२५ में शिकायतकर्ता के पुत्र अधिवक्ता उदित मैंदीरत्ता ने कंपनी के खुशी ऐप पर फंड वैल्यू अचानक गिरते हुए देखी। जब उन्होंने कंपनी से संपर्क किया तो पता चला कि यह कोई शॉर्ट-टर्म प्लान नहीं बल्कि ५ से ७ साल के लॉक-इन पीरियड का चक्रव्यूह है। मामला तब और गंभीर हो गया जब ८ सितंबर २०२५ को पिता-पुत्र कृष्णा होटल के पास स्थित जबलपुर शाखा पहुंचे। वहां के दस्तावेजों ने उनके पैरों तले जमीन खिसका दी, क्योंकि जो पॉलिसी १ साल की थी, उसे ७ साल के आवर्ती भुगतान में बदलकर वर्ष २०९३ तक यानी ६८ साल के लिए लॉक कर दिया गया था। नवंबर २०२५ में कर्मचारी ने खुद पीड़ित के दफ्तर आकर रोते हुए स्वीकार किया कि उसने टारगेट के भारी दबाव में यह पाप किया था।
अस्पताल के आईसीयू तक पहुंचे जालसाजी के हाथ
शर्मनाक हरकतों की हद तो तब पार हो गई जब ३१ दिसंबर २०२५ को पीड़ित को दूसरा ७ लाख रुपये का प्रीमियम भरने का नोटिस मिला। ६ जनवरी २०२६ को दी गई लिखित शिकायत को कंपनी ने २७ जनवरी २०२६ को पूरी तरह ठुकरा दिया। इसके बाद १३ फरवरी २०२६ को इंदौर कार्यालय के एक बड़े अधिकारी ने फोन कर माना कि महिला कर्मचारी एक नंबर की फ्रॉड है और उसे नौकरी से निकाल दिया गया है। कंपनी ने गलती सुधारने का नाटक करते हुए पॉलिसी बदलने का झांसा दिया। उस वक्त वरिष्ठ अधिवक्ता राजेश मैंदीरत्ता अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रहे थे, लेकिन कंपनी की बेशर्म कर्मचारी वहां भी पहुंच गई और बीमारी की हालत में उनके लाइव फोटो और ओटीपी ले आई। इस धोखेबाजी के बीच ५ मार्च २०२६ को कंपनी ने उनके बैंक खाते में डाका डालते हुए ७ लाख रुपये की दूसरी किस्त जबरन साफ कर दी।
अदालत के कटघरे में बीमा कंपनी, २९ जून को सुनवाई
इस धोखाधड़ी के खिलाफ ३० मार्च २०२६ को विस्तृत लीगल नोटिस भेजे जाने के बावजूद कंपनी ने २ अप्रैल २०२६ को चालाकी दिखाते हुए पॉलिसी बदलने का आवेदन ही रिजेक्ट कर दिया। अब वकील ने इस कंपनी को घुटनों पर लाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया है। पीड़ित अधिवक्ता ने फोरम से पूरी १४,००,००० रुपये की राशि १८% भारी वार्षिक ब्याज के साथ वापस मांगी है। इसके साथ ही इस मानसिक प्रताड़ना के लिए २,५०,००० रुपये, वित्तीय नुकसान के लिए ५,००,००० रुपये का हर्जाना और कोर्ट का पूरा खर्च वसूलने की मांग की है। उपभोक्ता फोरम द्वारा भेजे गए समन की तामीली ०७.०५.२०२६ को होने के बावजूद डर के मारे पीएनबी मेटलाइफ का कोई अधिकारी ०८.०६.२०२६ को कोर्ट में मुंह दिखाने नहीं आया। अब २९.०६.२०२६ की तारीख मुकर्रर की गई है, जहां इस धोखेबाज कंपनी पर कानून का हथौड़ा चलना तय है।
