हाईकोर्ट की जबलपुर बेंच से भोपाल क्षेत्र को हटाकर इंदौर में शामिल करने की बड़ी साजिश, सुप्रीम कोर्ट और मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजकर हस्तक्षेप की मांग
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की मुख्य पीठ जबलपुर के क्षेत्राधिकार को सीमित करने के उद्देश्य से भोपाल क्षेत्र को हटाकर उसे इंदौर बेंच के साथ जोड़ने की एक बड़ी साजिश रची जा रही है। इस गंभीर मामले को लेकर नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के अध्यक्ष डॉ. पी.जी. नाजपांडे ने गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने इस कथित साजिश के खिलाफ सीधे सुप्रीम कोर्ट और मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को एक आधिकारिक पत्र भेजकर तत्काल हस्तक्षेप करने की प्रार्थना की है। मंच के अनुसार, इंदौर और भोपाल के स्तर पर कुछ प्रभावशाली जनप्रतिनिधियों की मिलीभगत से यह गुप्त रणनीति तैयार की गई है। इस प्रयास से जबलपुर मुख्य पीठ का कार्यक्षेत्र काफी घट जाएगा, जिसे महाकोशल क्षेत्र और जबलपुर के हितों के साथ सरासर नाइंसाफी तथा इसकी क्षेत्रीय अस्मिता पर गहरा आघात माना जा रहा है। इस प्रशासनिक फेरबदल के विरोध में डेमोक्रेटिक लॉयर्स फोरम के एडवोकेट ओ.पी. यादव, एडवोकेट रविन्द्र गुप्ता सहित नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शन मंच के रजत भार्गव और एडवोकेट वेदप्रकाश अधौलिया ने एकजुट होकर सभी सामाजिक व कानूनी संगठनों की एक संयुक्त बैठक बुलाने का निर्णय लिया है ताकि आंदोलन की ठोस रणनीति तय की जा सके।
मुख्यालय को स्थानांतरित करने के पूर्व प्रयास
जबलपुर हाईकोर्ट का अतीत में भी विखंडन किया जा चुका है, जिसके बाद इसके मुख्य मुख्यालय को ही जबलपुर से पूरी तरह हटाने की गंभीर कोशिशें की गई थीं। उस समय भी क्षेत्रीय अस्मिता को बचाने के लिए नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के अध्यक्ष डॉ. पी.जी. नाजपांडे आगे आए थे। उन्होंने इस कदम के विरोध में हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी। इस विधिक हस्तक्षेप के बाद ही मुख्यालय को स्थानांतरित करने का मामला पूरी तरह टल सका था।
आयोग और ट्रिब्यूनल को बाहर भेजने पर आपत्ति
वर्ष 1987 में देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी, जिसके तहत यह स्पष्ट किया गया था कि हाईकोर्ट का मुख्यालय जहां स्थित होता है, वहीं पर महत्वपूर्ण राज्य स्तरीय आयोगों और ट्रिब्यूनलों के दफ्तर भी स्थापित होने चाहिए। इस स्पष्ट दिशा-निर्देश के बावजूद वर्तमान समय में प्रदेश के बहुतांश महत्वपूर्ण आयोग और ट्रिब्यूनल जबलपुर की सीमा से बाहर स्थापित कर दिए गए हैं। नियमों के इस उल्लंघन के विरोध में डॉ. पी.जी. नाजपांडे द्वारा दायर की गई एक अन्य जनहित याचिका वर्तमान में न्यायालय में लंबित है।
सामाजिक संगठनों द्वारा तीखा विरोध
क्षेत्रीय न्याय प्रणाली और जबलपुर के अधिकारों के हनन की इस नई साजिश के सामने आते ही शहर के प्रमुख वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मोर्चा खोल दिया है। डेमोक्रेटिक लॉयर्स फोरम और नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शन मंच से जुड़े प्रमुख कानूनी विशेषज्ञों ने यह साफ कर दिया है कि वे इस मनमाने बदलाव को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे। इसके विरोध में बहुत जल्द एक व्यापक स्तर पर बैठक का आयोजन किया जा रहा है जिसमें विरोध प्रदर्शन की रूपरेखा पर अंतिम मुहर लगाई जाएगी
बड़े संस्थानों की विदाई पर जनप्रतिनिधियों की रहस्यमयी चुप्पी
जबलपुर के अधिकारों पर लगातार हो रहे इन हमलों के बीच शहर के जनप्रतिनिधियों और स्थानीय शुभचिंतकों की रहस्यमयी चुप्पी सबसे बड़ा सवाल बनकर उभरी है। पूर्व में भी ऐसे कई बड़े सरकारी दफ्तर और महत्वपूर्ण संस्थान जबलपुर के हाथ से निकलकर भोपाल, इंदौर और उज्जैन स्थानांतरित हो चुके हैं, लेकिन स्थानीय नेतृत्व मूकदर्शक बना रहा। चाहे किसी भी राजनीतिक पार्टी के नेता हों, सामाजिक संगठन हों या शहर की नामचीन दिग्गज हस्तियां, सभी इस गंभीर मुद्दे पर मौन साधे हुए हैं। महाकोशल के विकास और पहचान को बचाने के लिए अब समय आ गया है कि ये सभी जिम्मेदार लोग अपनी चुप्पी तोड़ें और जबलपुर के अस्तित्व की रक्षा के लिए खुलकर सामने आकर विरोध दर्ज कराएं।
